पंजाबी ढोल क्या होता है
पंजाबी ढोल या काहे की दो होल वाला वाद्य यंत्र ढोल एक ऐसा वाद्ययत्र है जो लकड़ी फाइबर लोहा स्टील या अन्य धातु के साथ साथ रस्सी जानवर की खाल आदि से मिलकर बनता है इसका आकार सिलैंडरिकल होता है बीच में इसका बेस होता है जो की शीशम की या आम की अच्छी गुणवत्ता वाली लकड़ी या फिर प्लास्टिक फाइबर लोहा स्टील आदि से बनता है यह खाली गोल सिलेंडर (ड्रम) के आकार का होता है जिसे अग्रेजी मैं ड्रम और हिंदी में ढोल कहते हैं जो दोनों तरफ सेखुला है दोनों तरफ से खुले हुए हिस्से को जानवर की खाल या फिर फाइबर से बने (पूरी य पूड़ा) को सुतली या प्लास्टिक रस्सी से ढोल के दोनों खुले हिस्सों पर बांध दिया जाता है जिसकी एक हिस्से को बेस और दूसरे हिस्से को ताल कहते हैं, रसिया सतली का काम ढोल की बसें और लाल को सही करने या तून करने के लिए उपयोग किया जाता है रस्सी जितना टाइट बंदीहोगी बेस और ताल उतना ही अच्छा आता है ढोल बजाने के लिए एक मोटे दडी जिसे दगा और एक पतली दांडी जिसे चांठी कहते हैं से ढोल बजाया जाता है बस को दगा से और टाल को चांटी से बजाया जाता है इसकी कुछ प्रसिद्ध ताल (बीट) है भांगड़ा, चौकड़ी, पंजाबी लोक, बॉलीवुड गानों और बोली साथ आदी
ढोल के प्रकार
ढोल का प्रकार उसके बनावटी आकर लंबाई पर निर्भर करता है, पंजाबी ढोल इनका आकार लंबा होता है और गोलाई 10 इंच के आसपास होती है, देसी ढ़ोल इनकी लंबाई ज्यादा नहीं होती परंतु गोलाई लगभग 30 इंच होती है और यह जानवर की खाल से बने होते हैं, नासिक ढोल इनकीभी लंबाई ज्यादा नहीं होती और गोलाई लगभग 30 इंच की होती है यह दोनों फाइबर और जानवर कीखाल से बने होते हैं परंतु इनका स्वर काफी तेज़ होता हैं
ढोल का इतिहास
धूल प्राचीन काल से ही अस्तित्व में है हिंदुओं में ढोल ढोलक का भगवान देवी-देवताओं क्यों उपासना या आवाहनके लिए किया जाता था आगे चलकर इसका उपयोग राजाओं ने अपने राज्य में सूचना देने के लिए या डिग्गी बुलवाने के लिए किया लगभग 1800 के आसपास धूल शब्द का लिखित प्रमाण संगीतसार नामक ग्रंथ से मिला था धीरे-धीरे इसका उपयोग मनोरंजन के लिए किया जाने लगा। फिर 19वीं शताब्दी में ढोल का उपयोग बड़े-बड़े राजाओं जमीदारों के स्वागत और कार्यक्रमों में ढोल बजाने की शुरुआती हुई। धीरे-धीरे ढोल और इसकी मनोरंजन और जोशीले लाल ने अपनी जगह हर व्यवहार कार्यक्रम में बना ली और अभी सभी छोटे-बड़े हरपकार के कार्यक्रम ऑन का मनोरंजन और जोश बढ़ाने के लिए बजाए जाने लगे।
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